Kesar केसर

Screen Shot 2016-02-17 at 4.44.32 PM

Advertisements

रहीम

Brotherhood
Brotherhood

एक और बरस

एक और बरस अब बीत गया या आने वाला है
ये भी किस्सों की परतों में दब जाने वाला है

परतें दर परतें जम जम कर पत्थर बन जाती हैं
बीच उसी के पत्ते लकड़ी सब जड़ जाती है

बनते है जीवाश्म कई फिर ढूँढे जाते हैं
जाने कौन बरस के किस्से मुंडे जाते हैं

वो भी होगा नया बरस जब लोगो ने माना
हमने उनकी परतें सारी खोल के ये जाना

चलो अपने जीवाश्मों को कुछ जांच परख हम लें
नया साल और बात पुरानी साथ साथ रख लें

चुरा लेंगे

Chura Lenge
Chura Lenge

क्या बात है आप आजकल आते नहीं…

क्या बात है आप आजकल आते नहीं…
आयें कैसे आप आजकल बुलाते नहीं,

और अगर बुलाया भी तो ठीक से बैठाते नहीं,
दो बिस्किट प्लेट में रख के कह देते हो की
गर्मियों का मौसम है, और चाय पिलाते नहीं…

मौसम बदल जाने की बातें करते हो,
और खुद बदल जाने से कतराते नहीं.

अजीब आदमी हो यार, खातिरदारी करनी आती नहीं,
और कहते को की
क्या बात है आप आजकल आते नहीं…

मुझे घर नहीं जाना क्यूंकि दिल्ली बीच में पड़ता है

मुझे घर नहीं जाना क्यूंकि दिल्ली बीच में पड़ता है.
ये डर आज से नहीं, कई साल पहले से है.
जब पहली बार दिल्ली के बारे में सुना था तो बड़ी हंसी आई थी. बचपन में पडोस की एक दादी किसी रिश्तेदार को मिलने दिल्ली गयी. उनके एक बच्चे ने कहा “दादी, दिल्ली दिल वालों की.”  दादी ने कहा, “हट, दिल्ली दिल वालों की नहीं, गू खान्दारो की, यमुना का हाल देखा है, कितनी गन्दी कर के राखी है.” उनकी ये बात पुरे मौहल्ले में फैली और लोग हंस हंस के लोट- पोट हो गए.
जब बड़े होकर मुझे दिल्ली पास करते हुआ अन्य जगहों जाना पड़ा तो समझ में आया की सच में दिल्ली के रेलवे स्टेशन और सडकों पर लोग ऐसे घूरते हैं की मानो पहली बार किसी स्त्री जाती के प्राणी को देखा है. और फब्तियां कसना तो जैसे, इतना सामान्य है कि जैसे साँस लेना. ऐसा नहीं की बाकि भारत लुच्चई की इस परंपरा से अछूता है. बाकि सब जगहों में भी लोग जानना चाहते हैं जनानियों को. पर दिल्ली में कुछ ऐसा लगता है की लड़की होके कुछ तो पाप कर दिया,  आपको घूरने वाला चाहता है की आप इस बात से भली भांति अवगत हो, की आपको घूरा जा रहा है और और मौका मिला तो शायद छू भी लें.
कई बार दिल्ली की सडकों पर चलते चलते कोई महंगी तेज रफ़्तार कार यदि आपको स्पर्श करते निकल जाए तो इसे भूलना की बेहतर है, अगर चिल्ला के गली-गलोज किया तो न जाने कर शायद वापस लौट आये. और उसके बाद तो भगवन ही मालिक है.
बड़े आश्चर्य की बात तो यह है की मेरे कई परम मित्र दिल्ली निवासी हैं. वो लोग तो बहुत अच्छे से रहते हैं और मदद भी करते हैं. एक बार यूँ ही मेरी एक दिल्ली निवासी मित्र से बात हो रही थी की यार, क्यूँ दिल्ली में इतना आतंक है, केवल मैं ही नहीं मेरे जानने वाले सारे लोग, चाहे वो स्त्री हो या पुरुष, इस शहर के नाम से बड़ा घबराते है. “मेरे एक रिश्तेदार ने एक बार दिल्ली की सिर की, बस में घूमने के बाद जब वो वापस घर आये तो उनके जेब के पास तंग में कुछ जलन महसूस हुई, खोल के देखा तो एक ब्लेड का सा चिरा लगा है और जेब का निचला हिस्सा, जहाँ पैसे होते हैं वो कट कर गायब है. वाह यार! मानना पड़ेगा, कलाकारी को, शायद इसीलिए इसे जेब काटना कहते हैं क्युकी सच में ही जेब गायब थी. ऐसा नहीं की बाकि जगह लोग बड़े शरीफ हैं, पर हाथ की ऐसी सफाई तो बस…” ये सब सुनकर मेरी मित्र बोली की ‘यार देखो, दिल्ली में लोग जगह-जगह से आते हैं, पैसे कमाने, बिहार, यू पी, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल. कुछ जिनके पास कुछ नहीं, कुछ जो कश्मीर जैसी समस्या से भाग के आये है या पुनार्विस्थापित किये गए हैं कुछ जिनके पास पैसे हैं और वो और पैसे चाहते हैं. ये सारे लोग बड़े दुखी हैं, दिल्ली में जीना कितना मुश्किल है और इनमें प्रतिस्पर्धा की बड़ी भावना है, ये किसी को खुद से आगे बढने नहीं दे सकते… और शायद इनके साथ भी इसी प्रकार का व्यव्हार हुआ हो.”
ये सब सुनने के बाद मुझे लगा की हो सकता है की इस दुखभरी दिल्ली में ये लोग जो मनोरंजन के लिए महिलाओं को अपना शिकार बनाते हैं, शायद किसी बड़ी भारी परेशानी से जूझ रहे हैं. और परेशानी ऐसी की आम लोगों की समझ से बाहर.
अभी कुछ ही दिन हुए, मुझे एक भाईसाहब मिले, दिल्ली निवासी.
तो बात छिड़ गयी, दिल्ली और इसके अनोखे लोगों की. “भाईसाहब का कहना था की बाकि जगह तो लोग आपको बिना बताये बेवक़ूफ़ बनाते हैं मगर अपनी राजधानी में, बोल के, की देखिये आपको बेवक़ूफ़ बना रहे है, बुरा मत मानियेगा हम तो ऐसे ही हैं, आपको झेलना है तो ठीक नहीं तो हम झिलवा देंगे”.
बहुत दुःख है भाई इनकी जिंदगी में.
ये तो हुई बात उस दिल्ली की जो रेलवे स्टेशनों और बस स्टेंडो के आस- पास मैंने स्वयं महसूस की है. इसके अलावा भी एक दिल्ली है जो गुडगाँव के बड़े बड़े बहुमंजिला इमारतों और हौज खास के रेस्तरां में बस्ती है, जहाँ मैंने बहुत कम हिंदी भासियों को देखा. और इंग्लिश ऐसी की मनो अभी भी अँगरेज़ भारत में हैं, और पार्ट टाइम ट्युशन देते हैं. इन जगहों पर नामालूम कौन कौन से ब्रांड्स, जिनका मैं उच्चारण भी ठीक से नहीं कर पाती, पहनकर लोग घूमते हैं. और एअरपोर्ट के सिक्यूरिटी चेक की भांति उसी रेलवे स्टेशन वाली लुच्चई से आपको स्कैन किया जाता है.
ऐसा नहीं की दिल्ली के लोगों से मुझे दुश्मनी है या वे मुझे भयभीत करते हैं. बात ये है की आज भी मेरे कुछ खास मित्र दिल्ली निवासी हैं पर फिर भी मुझे घर जाने के लिए एक हज़ार बार सोचना पड़ेगा क्युकी मुझे दिल्ली बीच में पड़ता है.

खाली कमरा

आँखों के पास कमरा खाली था
आँखों के पास कमरा खाली था तो
उसने सोचा की चलो एक किरायेदार रख ले.
एक सपने को बुलाया विचारों के ब्रोकर ने
और उसे आँखों का खाली कमरा दिखलाया.

आँखें भी सपने को पाकर खुश थी बड़ी
क्यूकी गुजारा करने की उम्मीद जो नज़र आई थी.
सपना मज़े से रहने लगा आँखों में
आखिर जगह पायी थी उसने लाखो में.

एक दिन अचानक सपने ने देखा की बालकोनी में कोई डेरा जमाये बैठा है.
एक दिन अचानक सपने ने देखा की बालकोनी में कोई डेरा जमाये बैठा है…
जाँच पड़ताल की तो पता चल की आंसू भाईसाब फरमायें हैं,
और बोरिया बिस्टर लेकर हमेशा रहने के इरादे से आये हैं.

जब बात आँखों तक पहुंची तो आँखों ने की तफ्तीश.
अरे भाई आंसू ,” कैसे रह सकते हो तुम बिना डेपोसिट बिना फीस …
मैं तो नियति से बंधा हूँ ऐसा आंसू ने बोला
और बातो ही बातो में ये गहरा राज खोला.

सपने जब हवा में होते हैं तो रह जाते हैं
पर जब आँखों में बसते  हैं तो आंसू के साथ बह जाते हैं !!!