किल्ला – फिल्म समीक्षा

आये दिन सुनती थी की मराठी सिनेमा में बहुत ही बढ़िया काम हो रहा है।  इसीलिए मैंने मराठी फिल्में देखनी शुरू कर दी , हालाँकि “काय झाल”, “छान” जैसे इक्का दुक्का शब्दों के आलावा मुझे ज्यादा बोलना नहीं आता, लेकिन मराठी ससुराल की वजह से बहुत कुछ समझ आता है, वैसे समझना ज़रूरी भी है, क्यों? माला माहिती है

तो जी तय हो गया, किल्ला तो देखना ही है।  और आखिर में रात दस – पैंतालीस के शो की बुकिंग करवा ली। फिल्म सब-टाइटल के साथ दिखाई जा रही थी जिससे मेरा उत्साह कुछ और बढ़ गया।  ये बात अलग है की अंग्रेजी भाषा से मेरी कोई खासी दोस्ती नहीं है।

तो फिल्म शुरू हुई, बहुत ही रमणीय दृश्यों के साथ।  जी करता था की सायकल उठाऊँ और मैं भी चिन्मय और उसके दोस्तों के साथ कोंकण की खुली हवा में एक-आध चक्कर काट लूँ।

फिल्म की कहानी क्या है ये बताना यहाँ पे वाजिब नहीं होगा लेकिन फिल्म देखने से पहले मेरे मन में कई बार ये प्रश्न आया की आखिर किल्ला क्यों, यहाँ तक की फिल्म देखते समय भी मुझे लगा की शायद किल्ले में कुछ घटना होगी।  घटना हुई पर ऐसी नहीं की फिल्म का नाम ही उस पर रखा जाये।  वैसे तो फिल्म का नाम अंड्या भी हो सकता था।

लेकिन गौर करने की बात ये है की बच्चा नयी जगह में आया है और नया माहौल, नया खाना , नया स्कूल सब उसके लिए दीवारो जैसे हैं और वो उन दीवारों को भेद कर अपने लिए एक जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।  और हर नयी जगह जहाँ भी बच्चा अपनी माँ के साथ ट्रांसफर होके जाता है या जाने वाला है, एक नए किले के सामान है जो की उसे फतह करना है !

अब डायरेक्टर के मन में क्या था ये तो नहीं पता लेकिन फिल्म में एक – एक डायलाग सुन कर ऐसा लगता था जैसे बंदा बड़ी शिद्दत से कुछ कह रहा है।  लेकिन मेरे लोगों के लिए सब-टाइटल ज़रूरी है।

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