नर- तुम …

तकनीकी में इतने आगे के , सात समंदर लांघ सको .
हवा, नीर या हो कुदरत, तुम सबको काबू कर सकते…

छोटे मोटे जीव जंतु या बड़े भयंकर पशु पक्षी ,
सबके सब निश्छल हो जाते, जब करते तुम अपने मान की.

इक गहन प्रश्न मेरे अंतर में, जाने कब से है कौंध रहा…
काबू करना अपने मन पर, क्या इतना मुश्किल है ओ नर !!!

आये दिन अखबारों में मैं, पढ़ती खबरें बेबस मन की.
लाचार हुए ऐसे नर की जो मानवता को खो बैठा

वो बेचारा सा नर जो करता शक्ति प्रदर्शन नारी पर…
और मिथ्या पाले रहता के, है अपराजित है ताकतवर…

इक घृणित दया का मानो भाव रह रह कर मन में मेरे उठे.
हे नर तुम वानर क्यूँ न रहे… हे नर तुम वानर ही क्यों न रहे…

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